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प्रधान संपादक
“जब तक सूरज चाँद रहेगा, साहब कांशीराम जी आपका नाम रहेगा”9 अक्टूबर, मान्यवर कांशीराम साहेब के परिनिर्वाण दिवस के रूप में पूरे देश में बहुजन समाज के लोग उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं।कांशीराम साहेब केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि विचारों की वह शक्ति थे जिन्होंने बहुजन समाज को सामाजिक चेतना से लेकर राजनीतिक चेतना तक पहुँचाने का कार्य किया।कांशीराम: संघर्ष से निर्माण की कहानीखवासपुर (जिला रोपड़, पंजाब) में जन्मे कांशीराम साहेब ने अपने जीवन का आरंभ एक सामान्य कर्मचारी के रूप में किया, परंतु उनका लक्ष्य असामान्य था — समाज को समानता, सम्मान और अधिकारों की राह पर ले जाना।सर्वे ऑफ इंडिया की नौकरी ठुकराने से लेकर पुणे की एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेट्री (ERDL) में अन्याय के खिलाफ़ आवाज उठाने तक, उनका जीवन एक निरंतर संघर्ष का प्रतीक रहा।बुद्ध और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने संकल्प लिया “मैं न शादी करूँगा, न संपत्ति अर्जित करूँगा; अपना पूरा जीवन समाज के पुनर्निर्माण को समर्पित करूँगा।”बामसेफ से लेकर बहुजन समाज पार्टी तक का सफर1964 में नौकरी का त्याग करने के बाद उन्होंने बामसेफ (BAMCEF) की स्थापना की — एक ऐसा संगठन जिसने सरकारी कर्मचारियों को सामाजिक परिवर्तन की दिशा में संगठित किया।बाद में 1981 में उन्होंने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (DS-4) और 1984 में बहुजन समाज पार्टी (BSP) की स्थापना की, जिसने भारत की राजनीति में दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समाज को अपनी शक्ति पहचानने का अवसर दिया।कांशीराम साहेब कहते थे “राजनीति सत्ता के लिए होती है, और सत्ता बिना संघर्ष के नहीं मिलती।”उनकी रणनीति और नेतृत्व ने भारतीय राजनीति में नई दिशा दी। उन्होंने सिद्ध किया कि सत्ता सिर्फ़ कुछ वर्गों की जागीर नहीं है, बल्कि समाज के सबसे कमजोर तबके का भी उस पर अधिकार है।उनके विचार – आज भी प्रासंगिककांशीराम साहेब ने “शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो” के बाबा साहेब के मंत्र को अपने जीवन का मार्ग बनाया।उन्होंने कहा था “जिस समाज की राजनीतिक जड़ें मज़बूत नहीं होतीं, उसका अस्तित्व टिक नहीं पाता।”आज जब समाज फिर से सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव और आर्थिक विषमता की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब कांशीराम साहेब के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।भारत रत्न की मांग – जनता की आवाज़यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन महान व्यक्तित्वों ने करोड़ों लोगों के जीवन में जागरूकता की लौ जलाई, उन्हें आज भी भारत रत्न जैसे सर्वोच्च सम्मान से वंचित रखा गया है।जैसे बाबा साहेब आंबेडकर को यह सम्मान दशकों बाद मिला, वैसे ही अब समय आ गया है कि मान्यवर कांशीराम साहेब को भी उनके योगदान के अनुरूप सम्मान दिया जाए।वे न केवल बहुजन समाज के नेता थे, बल्कि भारत के सामाजिक-राजनीतिक पुनर्जागरण के शिल्पी थे।बहन मायावती जी के नेतृत्व में आगे बढ़ता कारवांकांशीराम साहेब का सपना आज बहन मायावती जी के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है। उनका मिशन “समानता पर आधारित समाज” आज भी करोड़ों बहुजनों के दिलों में जीवित है।लखनऊ में आयोजित परिनिर्वाण दिवस कार्यक्रम में लाखों लोगों की उपस्थिति इस बात का प्रतीक है कि कांशीराम साहेब के विचार आज भी जीवंत हैं, और यह जनसमूह पैसे से जुटाई भीड़ नहीं, बल्कि सम्मान और आस्था की भीड़ है।कांशीराम साहेब ने कहा था सत्ता की चाबी समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति के हाथ में देना ही असली लोकतंत्र है।”आज आवश्यकता है कि उनके योगदान को न केवल याद किया जाए, बल्कि उन्हें “भारत रत्न” से सम्मानित कर राष्ट्र उनका ऋण चुकाए।क्योंकि,“जब तक सूरज चाँद रहेगा, साहब कांशीराम जी आपका नाम रहेगा


